वन पर्व  अध्याय ५१

वृहदश्व उवाच

अथ देवाः पथि नलं ददृशुर्भूतले स्थितम् |  २६   क
साक्षादिव स्थितं मूर्त्या मन्मथं रूपसम्पदा ||  २६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति