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वन पर्व
अध्याय ५१
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वृहदश्व उवाच
ऊर्ध्वदृष्टिर्ध्यानपरा वभूवोन्मत्तदर्शना |  ३   क
न शय़्यासनभोगेषु रतिं विन्दति कर्हिचित् ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति