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विराट पर्व
अध्याय ५१
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वैशम्पाय़न उवाच
प्रभासितमिवाकाशं चित्ररूपमलङ्कृतम् |  १७   क
सम्पतद्भिः स्थितैश्चैव नानारत्नावभासितैः |  १७   ख
विमानैर्विविधैश्चित्रैरुपानीतैः सुरोत्तमैः ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति