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विराट पर्व
अध्याय ५१
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः शक्रः सुरगणैः समारुह्य सुदर्शनम् |  ३   क
सहोपाय़ात्तदा राजन्विश्वाश्विमरुतां गणैः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति