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विराट पर्व
अध्याय ५१
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वैशम्पाय़न उवाच
तद्देवय़क्षगन्धर्वमहोरगसमाकुलम् |  ४   क
शुशुभेऽभ्रविनिर्मुक्तं ग्रहैरिव नभस्तलम् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति