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भीष्म पर्व
अध्याय ५१
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सञ्जय़ उवाच
नाप्यन्तरिक्षं न दिशो न भूमिर्न च भास्करः |  २२   क
प्रजज्ञे भरतश्रेष्ठ शरसङ्घैः किरीटिनः ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति