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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ४४
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वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्तः स तु गान्धार्या कुन्तीमिदमुवाच ह |  २७   क
स्नेहवाष्पाकुले नेत्रे प्रमृज्य रुदतीं वचः ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति