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भीष्म पर्व
अध्याय ५१
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सञ्जय़ उवाच
न ह्येष समरे शक्यो जेतुमद्य कथञ्चन |  ३८   क
यथास्य दृश्यते रूपं कालान्तकय़मोपमम् ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति