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द्रोण पर्व
अध्याय ५१
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सञ्जय़ उवाच
पाणिं पाणौ विनिष्पिष्य श्वसमानोऽश्रुनेत्रवान् |  १९   क
उन्मत्त इव विप्रेक्षन्निदं वचनमव्रवीत् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति