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द्रोण पर्व
अध्याय ५१
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सञ्जय़ उवाच
धार्तराष्ट्रप्रिय़करं मय़ि विस्मृतसौहृदम् |  २२   क
पापं वालवधे हेतुं श्वोऽस्मि हन्ता जय़द्रथम् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति