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द्रोण पर्व
अध्याय ५१
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सञ्जय़ उवाच
पाय़सं वा यवान्नं वा शाकं कृसरमेव वा |  २८   क
संय़ावापूपमांसानि ये च लोका वृथाश्नताम् |  २८   ख
तानह्नैवाधिगच्छेय़ं न चेद्धन्यां जय़द्रथम् ||  २८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति