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कर्ण पर्व
अध्याय ५१
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सञ्जय़ उवाच
तापनं सर्वसैन्यानां घोररूपं सुदारुणम् |  १०२   क
समावृत्य महासेनां ज्वलति स्वेन तेजसा ||  १०२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति