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कर्ण पर्व
अध्याय ५१
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सञ्जय़ उवाच
एते चरन्ति पाञ्चाला दिक्षु सर्वासु भारत |  १०४   क
कर्णास्त्रं समरे प्राप्य दुर्निवारमनात्मभिः ||  १०४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति