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कर्ण पर्व
अध्याय ५१
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सञ्जय़ उवाच
नान्यं त्वत्तोऽभिपश्यामि योधं यौधिष्ठिरे वले |  १०७   क
यः समासाद्य राधेय़ं स्वस्तिमानाव्रजेद्गृहम् ||  १०७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति