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कर्ण पर्व
अध्याय ५१
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सञ्जय़ उवाच
धार्तराष्ट्रमुदग्रं हि व्यूढं दृष्ट्वा महावलम् |  २१   क
यस्य त्वं न भवेस्त्राता प्रतीय़ात्को नु मानवः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति