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कर्ण पर्व
अध्याय ५१
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सञ्जय़ उवाच
मज्जन्तमप्लवे मन्दमुज्जिहीर्षुः सुय़ोधनम् |  ३३   क
तथा चरन्तं समरे तपन्तमिव भास्करम् |  ३३   ख
न शेकुः सृञ्जय़ा द्रष्टुं तथैवान्ये महीक्षितः ||  ३३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति