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अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
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वृहस्पतिरु उवाच
हृत्वा पैष्टमपूपं च कुम्भोलूकः प्रजाय़ते |  ९८   क
फलं वा मूलकं हृत्वा अपूपं वा पिपीलिकः ||  ९८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति