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कर्ण पर्व
अध्याय ५१
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सञ्जय़ उवाच
यदि वा द्विपदां श्रेष्ठ द्रोणं मानय़तो गुरुम् |  ५५   क
अश्वत्थाम्नि कृपा तेऽस्ति कृपे चाचार्यगौरवात् ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति