कर्ण पर्व  अध्याय ५१

सञ्जय़ उवाच

इमं पापमतिं क्षुद्रमत्यन्तं पाण्डवान्प्रति |  ५८   क
कर्णमद्य नरश्रेष्ठ जह्याशु निशितैः शरैः ||  ५८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति