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कर्ण पर्व
अध्याय ५१
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सञ्जय़ उवाच
कर्णाद्धि मन्यते त्राणं नित्यमेव सुय़ोधनः |  ६१   क
ततो मामपि संरव्धो निग्रहीतुं प्रचक्रमे ||  ६१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति