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कर्ण पर्व
अध्याय ५१
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सञ्जय़ उवाच
यत्तत्रापि च दुष्टात्मा कर्णोऽभ्यद्रुह्यत प्रभो |  ७२   क
अशक्नुवंश्चाभिमन्योः कर्णः स्थातुं रणेऽग्रतः ||  ७२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति