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कर्ण पर्व
अध्याय ५१
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सञ्जय़ उवाच
अथ द्रोणस्य समरे तत्कालसदृशं तदा |  ७५   क
श्रुत्वा कर्णो वचः क्रूरं ततश्चिच्छेद कार्मुकम् ||  ७५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति