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कर्ण पर्व
अध्याय ५१
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सञ्जय़ उवाच
तस्य पापस्य तद्वाक्यं सुवर्णविकृताः शराः |  ८१   क
शमय़न्तु शिलाधौतास्त्वय़ास्ता जीवितच्छिदः ||  ८१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति