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अनुशासन पर्व
अध्याय ६५
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देवा ऊचुः
त्वं हि सर्वस्य जगतः स्थावरस्य चरस्य च |  १९   क
प्रभुर्भवसि तस्मात्त्वं समनुज्ञातुमर्हसि ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति