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कर्ण पर्व
अध्याय ५१
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सञ्जय़ उवाच
अद्य स्वशोणिते मग्नं शय़ानं पतितं भुवि |  ८७   क
अपविद्धाय़ुधं कर्णं पश्यन्तु सुहृदो निजाः ||  ८७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति