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द्रोण पर्व
अध्याय १३५
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सञ्जय़ उवाच
ततः प्रविव्यथे सेना पाण्डवी भरतर्षभ |  ४८   क
दृष्ट्वा द्रौणेर्महत्कर्म वासवस्येव संय़ुगे ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति