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कर्ण पर्व
अध्याय ५१
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सञ्जय़ उवाच
ततः सुय़ोधनो दृष्ट्वा हतमाधिरथिं त्वय़ा |  ९०   क
निराशो जीविते त्वद्य राज्ये चैव धनञ्जय़ ||  ९०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति