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कर्ण पर्व
अध्याय ५१
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सञ्जय़ उवाच
एते द्रवन्ति पाञ्चाला वध्यमानाः शितैः शरैः |  ९१   क
कर्णेन भरतश्रेष्ठ पाण्डवानुज्जिहीर्षवः ||  ९१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति