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कर्ण पर्व
अध्याय ५१
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सञ्जय़ उवाच
न त्वेव भीताः पाञ्चालाः कथञ्चित्स्युः पराङ्मुखाः |  ९५   क
न हि मृत्युं महेष्वासा गणय़न्ति महारथाः ||  ९५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति