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शल्य पर्व
अध्याय ५१
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जनमेजय़ उवाच
कथं कुमारी भगवंस्तपोय़ुक्ता ह्यभूत्पुरा |  १   क
किमर्थं च तपस्तेपे को वास्या निय़मोऽभवत् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति