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शल्य पर्व
अध्याय ५१
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वैशम्पाय़न उवाच
सा रात्रावभवद्राजंस्तरुणी देववर्णिनी |  १७   क
दिव्याभरणवस्त्रा च दिव्यस्रगनुलेपना ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति