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शल्य पर्व
अध्याय ५१
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वैशम्पाय़न उवाच
सानुज्ञाताव्रवीद्भूय़ो योऽस्मिंस्तीर्थे समाहितः |  २०   क
वत्स्यते रजनीमेकां तर्पय़ित्वा दिवौकसः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति