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शल्य पर्व
अध्याय ५१
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वैशम्पाय़न उवाच
साधय़ित्वा तदात्मानं तस्याः स गतिमन्वय़ात् |  २३   क
दुःखितो भरतश्रेष्ठ तस्या रूपवलात्कृतः |  २३   ख
एतत्ते वृद्धकन्याय़ा व्याख्यातं चरितं महत् ||  २३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति