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शल्य पर्व
अध्याय ५१
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वैशम्पाय़न उवाच
तां च दृष्ट्वा भृशं प्रीतः कुणिर्गार्ग्यो महाय़शाः |  ४   क
जगाम त्रिदिवं राजन्सन्त्यज्येह कलेवरम् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति