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शल्य पर्व
अध्याय ५१
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वैशम्पाय़न उवाच
सुभ्रूः सा ह्यथ कल्याणी पुण्डरीकनिभेक्षणा |  ५   क
महता तपसोग्रेण कृत्वाश्रममनिन्दिता ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति