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शान्ति पर्व
अध्याय ५२
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वैशम्पाय़न उवाच
कथं त्वय़ि स्थिते लोके शाश्वते लोककर्तरि |  १३   क
प्रव्रूय़ान्मद्विधः कश्चिद्गुरौ शिष्य इव स्थिते ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति