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शान्ति पर्व
अध्याय ५२
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वासुदेव उवाच
न ते ग्लानिर्न ते मूर्छा न दाहो न च ते रुजा |  १६   क
प्रभविष्यन्ति गाङ्गेय़ क्षुत्पिपासे न चाप्युत ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति