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शान्ति पर्व
अध्याय ५२
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वासुदेव उवाच
सत्त्वस्थं च मनो नित्यं तव भीष्म भविष्यति |  १८   क
रजस्तमोभ्यां रहितं घनैर्मुक्त इवोडुराट् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति