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शान्ति पर्व
अध्याय ५२
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वैशम्पाय़न उवाच
लोकनाथ महावाहो शिव नाराय़णाच्युत |  २   क
तव वाक्यमभिश्रुत्य हर्षेणास्मि परिप्लुतः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति