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शान्ति पर्व
अध्याय ५२
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो रथैः काञ्चनदन्तकूवरै; र्महीधराभैः समदैश्च दन्तिभिः |  ३१   क
हय़ैः सुपर्णैरिव चाशुगामिभिः; पदातिभिश्चात्तशरासनादिभिः ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति