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शान्ति पर्व
अध्याय ५२
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः पुरस्ताद्भगवान्निशाकरः; समुत्थितस्तामभिहर्षय़ंश्चमूम् |  ३३   क
दिवाकरापीतरसास्तथौषधीः; पुनः स्वकेनैव गुणेन योजय़न् ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति