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शान्ति पर्व
अध्याय ५२
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः पुरं सुरपुरसंनिभद्युति; प्रविश्य ते यदुवृषपाण्डवास्तदा |  ३४   क
यथोचितान्भवनवरान्समाविश; ञ्श्रमान्विता मृगपतय़ो गुहा इव ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति