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वन पर्व
अध्याय १
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वैशम्पाय़न उवाच
दुर्योधनो गुरुद्वेषी त्यक्ताचारसुहृज्जनः |  १४   क
अर्थलुव्धोऽभिमानी च नीचः प्रकृतिनिर्घृणः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति