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अनुशासन पर्व
अध्याय ५२
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भीष्म उवाच
अविशङ्कश्च कुशिकस्तथेत्याह स धर्मवित् |  ३२   क
न प्रवोधय़तां तं च तौ तदा रजनीक्षय़े ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति