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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५२
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वैशम्पाय़न उवाच
या मे सम्भावना तात त्वय़ि नित्यमवर्तत |  १४   क
अपि सा सफला कृष्ण कृता ते भरतान्प्रति ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति