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भीष्म पर्व
अध्याय ११६
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सञ्जय़ उवाच
उपनीतं च तद्दृष्ट्वा भीष्मः शान्तनवोऽव्रवीत् |  १२   क
नाद्य तात मय़ा शक्यं भोगान्कांश्चन मानुषान् ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति