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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५२
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वैशम्पाय़न उवाच
पुनः पुनश्च वार्ष्णेय़ं पर्यष्वजत फल्गुनः |  २   क
आ चक्षुर्विषय़ाच्चैनं ददर्श च पुनः पुनः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति