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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ५२
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वासुदेव उवाच
न च ते तपसो नाशमिच्छामि जपतां वर |  २५   क
तपस्ते सुमहद्दीप्तं गुरवश्चापि तोषिताः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति