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सभा पर्व
अध्याय ५२
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युधिष्ठिर उवाच
महाभय़ाः कितवाः संनिविष्टा; माय़ोपधा देवितारोऽत्र सन्ति |  १४   क
धात्रा तु दिष्टस्य वशे किलेदं; नादेवनं कितवैरद्य तैर्मे ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति