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वन पर्व
अध्याय २३३
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वैशम्पाय़न उवाच
न्यवर्तन्त ततः सर्वे गन्धर्वा जितकाशिनः |  ७   क
दृष्ट्वा रथगतान्वीरान्पाण्डवांश्चतुरो रणे ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति