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शल्य पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
नाराय़णा हता यत्र गोपाला युद्धदुर्मदाः |  ३६   क
म्लेच्छाश्च वहुसाहस्राः किमन्यद्भागधेय़तः ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति